अपराध (Crime)
अपराध मोह तथा क्रोध के कारण होने वाली अपकार्य है। अतः मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा उसके अनेक आवश्यकता हैं और इससे मोह एवं क्रोध उत्पन्न होता है जिससे व्यक्ति अपराध को जन्म देता है।
दुष्कृति (Wrong)
यह एक सिविल अपकार्य होता है। इसका प्रभाव किसी व्यक्ति विशेष अथवा व्यक्तियों के समूह विशेष के सिविल अधिकारों पर पड़ता है। दुश कृति के लिए धान के रूप में क्षतिपूर्ति का आदेश दिया जाता है अतः दुष्ट कृति में क्षतिग्रस्त व्यक्ति की क्षतिपूर्ति करना मुख्य उद्देश्य होता है इसके लिए धन के रूप में छतिपूर्ति का आदेश दिया जाता है।
अपराध के मानसिक तत्व
किसी अपराध में मानसिक तत्व ही अपराधिक विधि सिद्धांतों को सुनिश्चित करते हैं यह इस प्रकार हैं
आशय (Intention)
हेतुक (Motive)
दुराशय (Mens rea)
ज्ञान (Knowledge)
निर्दोषिता (innocence)
तथ्य की भूल (Mistake of fact)
विधि की भूल (Mistake of law)
भारतीय दंड संहिता में शब्द दूर आशय का प्रवचन समस्त कर दिया गया है सुप्रसिद्ध विधि वेता एमसीसी तलवार ने अपनी पुस्तक का मामला इन इंडिया में इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कहा है कि भारत में दोषी मन का सिद्धांत अपराधों की विधिक परिभाषा ओं में सम्मिलित कर लिया गया है इसलिए अब अलग से इसके परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है और हरी प्रसाद बनाम स्टेट के मामले में दोहरा से को अपराध का एक आवश्यक तत्व स्वीकार किया गया है इस प्रकार स्टेट आफ महाराष्ट्र बनाम में आराम से झाड़ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया कि जब तक किसी कानून में अधूरा से को अपराध का एक आवश्यक तत्व मानने से इनकार नहीं कर दिया जाता तब तक किसी अभियुक्त को किसी अपराध के लिए दोषी नहीं माना जा सकता है यदि उसका मन ही दोषी ना रहा हो
भारत में छल अपराधिक न्याय भंग आदि मामलों में कपट पूर्ण या बेमानी पूरा आशय का होना अवश्य आवश्यक माना गया है इस प्रकार कूट रचना के मामले में मिथ्या दस्तावेज तैयार करना तथा ऐसे दस्तावेज से किसी को क्षति पहुंचाना का आशय आवश्यक माना गया है।
आशय (intention)
असाध्य का अगला कदम है डे का कार्य रूप में परिणत ही उसका आशय माना जाता है जहां दुश्मनी का बदला ले लेना यहां मृत्यु कार्य कर देना आशा है इस प्रकार के अपराध का प्रारंभिक तत्व है जबकि आज से उसके बाद का ऑस्टिन के अनुसार आशय कार्य का लक्ष्य है अर्थात प्रयोजन जिसका स्रोत है निकृष्ट आशय दोषपूर्ण कार्य का स्वामी है दुरस्त पास है या प्रयोजन उस संपूर्णा आशय का वह भाग है जो दोस्त वृत्त की परिधि से बाहर है वास्तव में दे अर्थात प्रयोजन आशय का एक रूप है
दुराशय (men's rea)
दुरा से अपराध का ही एक रूप है दुरा से का अभिप्राय दोषपूर्ण है अथवा आपराधिक आशय है कोई भी कार्य तब तक अपराध नहीं माना जाता जब तक वह अधूरा से से प्रेरित होकर नहीं किया गया है लेकिन यह धारणा सिर्फ ओन्ली विधि किए भारतीय विधि कि नहीं अगले विधि में चौकी अपराध के आवश्यक तत्व निर्धारित कर दिए गए हैं तोरा से अपराध के गठन के लिए एक अनिवार्य शर्त है इस सूत्र पर आधारित है एक्टर्स फेसिट रियम नीसी मेंस सीट रिया कि बिना किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं बनाता उदाहरण के तौर पर झाड़ी के पीछे छिपे किसी आदमी को जानवर समझ कर शिकारी उस पर गोली चलाता है और उसकी मृत्यु कार्य कर देता है यहां अपराध होते हुए भी उसे अपराधिक उत्तरदायित्व से मुक्त रखा जाएगा क्योंकि उसके मन में कोई भरोसा नहीं था
लेकिन भारतीय विधि विधि में ऐसे प्रत्येक कार्य को अपराध मान लिया जाता है जो विधि द्वारा वर्जित है फिर चाहे उसके पीछे अधूरा से रहा हो अथवा ना इस निरपेक्ष दायित्व के सिद्धांत के आधार पर रखा गया है जहां किसी समिति के अंतर्गत कोई कार्य किया जाना है और वह नहीं किया जाता तो उसे अपराध मान लिया जाए चाहे उसमें बुरा से पूर्णता भावे क्यों आ रहा है भारतीय विधि में जो कि प्रत्येक अपराध के साथ ही उसके आवश्यक तत्वों का उल्लेख कर दिया गया है
बता दो राशि को पृथक से एक तत्व के रूप में निरूपित किया गया है एक दिवस पूर्ण मनमोहित के रूप में स्वच्छता सास है कपट पूर्ण बेईमानी से आदि शब्दों का प्रयोग कर इस कमी को पूरा कर दिया गया है।
इंग्लिश विधि में इसका महत्व
इंग्लिश दंड विधि में दोहरा से मेंस रिया का एक महत्वपूर्ण स्थान है यह दांडी की विधि शास्त्र की आधारशिला है दांडी की विधि शास्त्र की यह मान्यता है कि दोषी मस्तिष्क के अभाव में किसी प्रकार का प्राधिकारी नहीं किया जा सकता
आशय के बिना केवल कार्य किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं बनाता
यही वह सूत्र है जिस पर संपूर्ण झंडे की विधि शास्त्र आधारित है इसके अनुसार कोई भी कार्य किसी को दोषी व्यक्ति नहीं बना देता जब तक कि उसका ऐसा आसान नहीं रहा यह सूत्र उतना ही पुराना है जितनी की इंग्लिश दंड विधि
यह सूत्र दो तत्वों से मिलकर बना है
शारीरिक कृत्य
दुराशय
सक्षमता
अपराध का दूसरा आवश्यक तत्व अपराधी व्यक्ति का अपराध कार्य करने के लिए सक्षम होना है सक्षम होने से अभिप्राय यहां विधिक साक्षरता से एक व्यक्ति सारे जी कथा भौतिक रूप से कोई कार्य करने के लिए सक्षम हो सकता है लेकिन विधिक रुप से वही व्यक्ति सक्षम नहीं माना जा सकता उदाहरण 7 वर्ष से कम आयु का कोई शिशु किसी व्यक्ति को कोई हानि हरित कर सकता है लेकिन दंड संहिता की धारा 82 के अंतर्गत उसे अपराध नहीं माना जाता है इस प्रकार संहिता में अन्य ऐसे कई अपराधों का उल्लेख किया गया है जो अपराध की श्रेणी में नहीं आते जैसे विपरीत व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य सद्भावना से किया गया कार्य दुर्घटना उसका तथा भूल के अधीन किया गया कार्य आदि इस प्रकार किसी कार्य को अपराध माना जा सकता है जबकि वह सभी तरह से अपराध की सीमा में आता है।
तथ्य की भूल
तथ्य की भूल छम में होती है और यह बचाव का एक अच्छा आधार हो सकती है या इस सूत्र पर आधारित है कि इग्नरेंस आफ है फैक्ट गुड एक्सक्यूज
संहिता की धारा 76 भी इसी प्रकार की व्यवस्था की गई है इसके अनुसार कोई बात अपराध नहीं है जो किसी व्यक्ति से व्यक्ति द्वारा की जाए जो उसे करने के लिए विधि द्वारा अवैध हो या जो तथ्य की भूल के कारण ना की विधि की भूल के कारण सदभावना पूर्वक वि
श्वास करता हूं कि वह उसे करने के लिए विधि द्वारा अवध है